Wednesday, May 9, 2012



जिंदगी......जिंदगी के बगैर


कभी तेरी ख़ामोशी


कभी तेरा गुस्सा



कभी तेरी आँखें

और

उनमे झलकता प्यार



कभी तेरा इनकार

कभी तेरा इकरार



कभी तेरी यादें

कभी तेरे ख्वाब



कभी तेरी चिठ्ठी

कभी तेरी तस्वीर



कभी तेरा ख्याल

और

कभी उसका जाल



कभी सिर्फ तेरा अहसास

तो

कभी तेरी गर्म सांस



कभी लगता है की ये सच है

पर

कभी लगता है ये छलावा है



जो भी है



पर



तेरे बिना जीना तो



मुश्किल है



जिंदगी



~ अbhay

Tuesday, April 17, 2012

जिंदगी की File

कई बार मैंने सोचा
की जिंदगी को Hibernate कर दू

चलती रहेगी जिंदगी की साँस
पर थोड़ी battery तो save कर लू

Files तो सारी खुली ही रहेंगी
पर उसे जमाने के लिए तो बंद ही कर दू

खैर क्या फर्क पड़ता है
Files खुली हो या बंद

सिवाय एक File के

जिसे

ना तो मै खुला छोड़ सकता हु

और

ना ही बंद कर सकता हु

~अbhay

Saturday, April 14, 2012

फिर ..एक...ब़ार

हर सवाल का का जवाब नहीं होता
पर फिर भी हम सवाल पूछते है

कभी खुदसे कभी दुसरो से
पर अक्सर खुद ही जवाब देते है
दूसरो से पूछे सवालो का भी
या फिर उम्मीद करते है
की वो भी वही जवाब दे


हर उम्मीद पूरी नहीं होती है
फिर भी हम उम्मीद करते है

कभी खुदसे कभी दूसरो से
पर अक्सर दुसरो से ज्यादा
और फिर सपने देखते है
उम्मीदे पूरी होने के


हर सपना सच नहीं होता है
चाहे छोटा हो या बड़ा हो

फिर भी हम सपने देखते है
और सपनो में खो जाते है
जब तक की कोई उसे तोड़
के हमें धरती पे ना गिरा दे
और फिर हम जख्म पाते है


हर जख्म ठीक नहीं होता
चाहे सतही हो या गहरा हो

फिर भी हम वक़्त की दुहाई देते है
की वक़्त के साथ हर जख्म भर ही जायेगा

और फिर एक ब़ार

सवाल पूछते है

उम्मीद करते है

सपने देखते है

नए जख्म पाते है

क्योंकि

जिंदगी है

और हम

जिंदगी के

हाथो मजबूर है

~ अभय

Friday, March 23, 2012

अब मैंने बरदाश्त करना सीख लिया है

अब मैंने बरदाश्त करना सीख लिया है
इस अकेलेपन को
इस तनहाई को
सुनी दीवारों को
इस अँधेरे को

लोगो के तानो को
अपनों के उलाहनो को
अब मैंने बरदाश्त करना सीख लिया है

दुश्मन की चाल को
अपनों के जाल को
अब मैंने बरदाश्त करना सीख लिया है

परायों के जुल्म को
अपनों के इल्म को
अब मैंने बरदाश्त करना सीख लिया है

दूसरो के वार को
अपनों के प्यार को
मैंने हर " नकाब " को बरदाश्त करना सीख लिया है

" नकाबो " की मुस्कुराहटो को
उनके " अपनेपन " को
अब मैंने बरदाश्त करना सीख लिया है

और भी काफी कुछ सीखा है मैंने

जैसे

खुद से नफरत करना

जजबातों का गला घोटना

खुद से अजनबी होना

साँस लेना

और

उसे याद रखना

की साँस लेना है

और फिर


कुछ देर और

जिन्दा रहना

बस नहीं

सीख पाया हु

मै अब तक

तुम्हे भूलना

और

तुम्हारे बगैर जीना

और शायद सीख भी नहीं पाउँगा

~ अभय

Saturday, March 10, 2012

जिंदगी का पहिया

उस चौराहे पे खड़ी वो कार
जब भी देखती है दूसरी कारों को
और सोचती है उनके बारे में
तो समझ नहीं पाती है
उनकी जिंदगी को
और उलझ जाती है
अपने खयालो में

बाजु वाली कार सफ़ेद रंग की
रोज सुबह जाती है ठीक ९ बजे
और लौट आती है शाम को ५ बजे
जैसे जिंदगी की रेखाए खीच दी हो

और वो दूसरी कार गुलाबी बंगले वाली
जाती है हर वीक एंड पे कही दूर
और आ कर सुनाती है किस्से
अपनी ऐय्याशी के
मानो वो ही उसकी जिंदगी का मकसद हो

या फिर सामने वाली बड़ी सी कार
जो हमेशा जाती है घुमने कभी पहाड़ो में
तो कभी समुन्दर के पास
पर रहती है अक्सर उदास वो
जैसे ये ही उसकी फितरत हो

उसे रश्क हो चला है
उन कारों की किस्मत पर
या तो है उलझन
खुद ही की जिंदगी पर

वैसे
उसे अक्सर दया आती है
उस पुरानी फियाट पे
जो अक्सर खड़ी होती है
पिछली पार्किंग में
उसे कोई नहीं निकालता
और ना ही कोई
पोछता भी है
जैसे उसका कोई
अस्तित्व ही ना हो


उसने हमेशा चाहा है
फर्राटे से सडको पे दौड़ना
और चाहा है
बेलगाम घूमना

पर शायद ये उसकी
किस्मत में नहीं

उसकी किस्मत में तो लिखा है
कभी कभी दौड़ना
सिर्फ पेट के लिए

या फिर घंटो खड़े
रहना इंतजार में
किसी के
इस उम्मीद में
की कोई बुलाये
और
उसकी जिदगी
सफल हो जाये

अब भी शायद उसे
कार
और
टेक्सी
के बीच
का फर्क
समझ में
नहीं
आया
है
शायद

Tuesday, February 14, 2012

वक़्त की गलती

जब भी मैंने मिलना चाहा, तो तुम्हारे पास वक़्त नहीं था

शायद ही कभी तुमने मिलना चाहा

पर तब भी तुम्हारे पास वक़्त नहीं था

कभी हम दोनों ने मिलना चाहा पर वक़्त को ये मंजूर नहीं था



मै जानता हु ये सिर्फ वक़्त की गलती है

Thursday, December 29, 2011

जख्म

अब जब जख्म भर चले है तो

क्यों तुम मुझे याद आते हो


अब जाकर मै इस भुलावे में आया था

की मै तुम्हे भूलने लगा हु


फिर एक ब़ार मेरे जिंदगी में आ के

क्यों मुझे सताते हो


जानता हु ये द्वन्द है मेरा.. मेरे मन से ही

चेतन मन का अचेतन मन से


बड़ी मुश्किल से इस मन ने उस मन को समझाया है

अब फिर से क्यों उसे रुलाते हो


अब जब जख्म भर चले है तो

क्यों तुम मुझे याद आते हो


जिंदगी के लम्हों को उलझा के

मैंने इन सांसों को सुलझाया है


फिर एक ब़ार अपनी निगाहों से

सुलझी सांसों को क्यों उलझाते हो


अब जब जख्म भर चले है तो

क्यों तुम मुझे याद आते हो


अब मै लहरों से दोस्ती करके

समंदर के आगोश में जाना चाहता हु


तो फिर क्यों आवाज दे के

मुझे वापस बुलाते हो


अब जब जख्म भर चले है तो

क्यों तुम मुझे याद आते हो