जिंदगी किसी नदी के मानिंद अविरत ... अविचल बहती जा रही थी
की अचानक तुम्हारे मिल जाने से ये जैसे ये अपना रास्ता भूल गयी
चाहा तो कभी ना था इसने उस रास्ते पे चलना
जिस राह पे ये यु ही अचानक मूड गयी
अब तो आगे बढ़ने के सिवाय कोई चारा ना था
वैसे भी पीछे लौटना मेरी जिंदगी ने कभी सिखा ही नहीं
कभी सपने देखने की जिद तो कभी फ़ना होने का जूनून
संभल कर चलना तो इसने कभी सोचा ही नहीं
जिंदगी के ये दो किनारे किसे छोडू किसके साथ चलता रहू
ये तो शायद मुझे नदी से ही सीखना होगा
नदी भी तो जिंदगी भर दो किनारों के साथ चलती है
Friday, December 16, 2011
Saturday, November 26, 2011
जिंदगी तेरे नाम
सर्दियों की शाम अक्सर उदास होती है
एक अजीब सा सन्नाटा होता है
जो मुझे झझकोर देता है
और मै बैचैनी से
ढूंढने लगता हु
उस सूरज को
जिससे
अपने हिस्से
की मुट्ठी भर
धुप ले सकू
जिसकी
नर्म गर्माहट
मुझे तेरी
याद दिलाये
ताकि
मै
कुछ दिन
और
साँस ले सकू
एक अजीब सा सन्नाटा होता है
जो मुझे झझकोर देता है
और मै बैचैनी से
ढूंढने लगता हु
उस सूरज को
जिससे
अपने हिस्से
की मुट्ठी भर
धुप ले सकू
जिसकी
नर्म गर्माहट
मुझे तेरी
याद दिलाये
ताकि
मै
कुछ दिन
और
साँस ले सकू
Tuesday, November 15, 2011
पहेली
दिल अक्सर तुमसे खफा होता है
और फिर
तुम्हे मनाने का तरीका भी ढूंढ़ता है
ये बागी रहता तो मेरे सीने में है
पर हरवक्त तुम्हारे इशारो पर धड़कता है
और फिर
तुम्हे मनाने का तरीका भी ढूंढ़ता है
ये बागी रहता तो मेरे सीने में है
पर हरवक्त तुम्हारे इशारो पर धड़कता है
Sunday, November 6, 2011
अँधेरा
सर्दियों में शाम कुछ जल्दी आती है
और अक्सर उदास कर जाती है
दूर कही उठता हुवा वो सिगडी का धुवा
और
सूरज के जाने के बाद तंग करने वाली
ठंडी हवाए
पेड़ो के लम्बे होते हुवे साये
और
बोझिल सन्नाटे में से किसी के गाने की आती हुवी आवाज
इन सब की जैसे अब आदत सी हो गयी है
दिये की लौ कभी कांपती हुवी
तो कभी अडिग हो कर जलती हुवी
मेरे अस्तित्व को चुनौती देती हुवी
मै उसे बुझा देता हु
क्योंकि मै उसकी चुनौती से डरता हु शायद
या फिर शायद
मुझे ये अँधेरा अच्छा लगने लगा है
और अक्सर उदास कर जाती है
दूर कही उठता हुवा वो सिगडी का धुवा
और
सूरज के जाने के बाद तंग करने वाली
ठंडी हवाए
पेड़ो के लम्बे होते हुवे साये
और
बोझिल सन्नाटे में से किसी के गाने की आती हुवी आवाज
इन सब की जैसे अब आदत सी हो गयी है
दिये की लौ कभी कांपती हुवी
तो कभी अडिग हो कर जलती हुवी
मेरे अस्तित्व को चुनौती देती हुवी
मै उसे बुझा देता हु
क्योंकि मै उसकी चुनौती से डरता हु शायद
या फिर शायद
मुझे ये अँधेरा अच्छा लगने लगा है
Tuesday, August 23, 2011
डर
मै तब जैसा था
आज भी
वैसा ही हु
पर शायद
अब
तुम्हारा नजरिया ही बदल गया है
वैसे और भी कुछ बदला है
मेरी जिंदगी में
अब मैंने समंदर पे जाना छोड़ दिया है
मुझे डर है कही
वो अकेली नाव
किनारे की ठंडी रेत
नारियल के वो पेड़
समंदर की लहरें
चंपा के मासूम फूल
वो अजनबी जिसने हमें रास्ता बताया था
और वो पुलिस वाला जिसने हमें धमकाया था
हमने इकट्ठी की हुई सीपिया
रात की तनहाई
सुबह का सूरज
ये सब
तुम्हारे बारे में ना पुछ ले
क्या जवाब दूंगा मै उन्हें
की मैंने तुम्हे खो दिया
या अपने आप को
या की अब मै
खुद ही को नहीं
पहचानता
आज भी
वैसा ही हु
पर शायद
अब
तुम्हारा नजरिया ही बदल गया है
वैसे और भी कुछ बदला है
मेरी जिंदगी में
अब मैंने समंदर पे जाना छोड़ दिया है
मुझे डर है कही
वो अकेली नाव
किनारे की ठंडी रेत
नारियल के वो पेड़
समंदर की लहरें
चंपा के मासूम फूल
वो अजनबी जिसने हमें रास्ता बताया था
और वो पुलिस वाला जिसने हमें धमकाया था
हमने इकट्ठी की हुई सीपिया
रात की तनहाई
सुबह का सूरज
ये सब
तुम्हारे बारे में ना पुछ ले
क्या जवाब दूंगा मै उन्हें
की मैंने तुम्हे खो दिया
या अपने आप को
या की अब मै
खुद ही को नहीं
पहचानता
Saturday, August 6, 2011
उधार की जिंदगी
पता नहीं
क्यों
हम अपनी
मजबूरियों को
समझदारी का नाम देते है
घोट देते है गला
अपनी आकांक्षाओ का
ओढ़ कर लबादा
अपनी जवाबदारियों का
दबा देते है
अपनी अभिव्यक्ति को
पहन कर मुखौटा
किताबी लब्जों का
खरीदना चाहते है
खुशियों को
चंद रुपयों के बदले में
किसी सब्जी के मानिंद
कोशिश करते है
खुश होने की
लेकर उधार की जिंदगी
चुकाते रहते है
उस कर्ज को
अपनी सांसों से
और
बाट जोहते है
उस मुक्ति की
जिसे हमने
कब का
जिंदगी के बदले में
गिरवी रख दिया है
क्यों
हम अपनी
मजबूरियों को
समझदारी का नाम देते है
घोट देते है गला
अपनी आकांक्षाओ का
ओढ़ कर लबादा
अपनी जवाबदारियों का
दबा देते है
अपनी अभिव्यक्ति को
पहन कर मुखौटा
किताबी लब्जों का
खरीदना चाहते है
खुशियों को
चंद रुपयों के बदले में
किसी सब्जी के मानिंद
कोशिश करते है
खुश होने की
लेकर उधार की जिंदगी
चुकाते रहते है
उस कर्ज को
अपनी सांसों से
और
बाट जोहते है
उस मुक्ति की
जिसे हमने
कब का
जिंदगी के बदले में
गिरवी रख दिया है
Wednesday, August 3, 2011
अल्फाज
अल्फाज
काफी सारे
कुछ तुमने कहे
और शायद कुछ मैंने भी
जो मैंने कहे थे वो अब भी मुझे याद है
और जो तुमने कहे थे
वो तो मै कभी भूल ही नहीं सकता
मुझे तो
वो अल्फाज भी याद है
जो तुमने कभी कहे ही नहीं
उसके लिए तुम्हारी आँखे ही काफी थी
जानता था की ये अल्फाजो का मायाजाल है
फिर भी उसमे उलझना अच्छा लगता था
वो शायद तुम्हारी हंसी का असर था
या फिर तुम्हारी मासूम आँखों का जादू था
जो तुम्हारी जुबां से ज्यादा बोलती थी
मै अब भी तय नहीं कर पा रहा हु की
मै तुम्हारी आँखों में
ज्यादा उलझता था या
तुम्हारी जुल्फों में
काफी सारे
कुछ तुमने कहे
और शायद कुछ मैंने भी
जो मैंने कहे थे वो अब भी मुझे याद है
और जो तुमने कहे थे
वो तो मै कभी भूल ही नहीं सकता
मुझे तो
वो अल्फाज भी याद है
जो तुमने कभी कहे ही नहीं
उसके लिए तुम्हारी आँखे ही काफी थी
जानता था की ये अल्फाजो का मायाजाल है
फिर भी उसमे उलझना अच्छा लगता था
वो शायद तुम्हारी हंसी का असर था
या फिर तुम्हारी मासूम आँखों का जादू था
जो तुम्हारी जुबां से ज्यादा बोलती थी
मै अब भी तय नहीं कर पा रहा हु की
मै तुम्हारी आँखों में
ज्यादा उलझता था या
तुम्हारी जुल्फों में
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