मुझे बारिशो में रोना अच्छा लगता है
ये बुँदे उन बूंदों में समां जाती है
और तुम्हे पता भी नहीं चलता है
ना सहा जाता है
और ना ही कहा जाता है
बस अब रहा नहीं जाता है
मेरे सपने मेरे आंसुओ में धुल जाते है
जब भी मै बारिशो में रोता हु
मेरे गम उन बूंदों में घुल जाते है
जब भी मै बारिशो में रोता हु
मुझे बारिशो में रोना अच्छा लगता है
ये बुँदे उन बूंदों में समां जाती है
और तुम्हे पता भी नहीं चलता है
मै कभी बारिशो में रोता हु
और कभी " बारिश " के लिए
जो भी है " बारिश " हर वक़्त मेरे जेहन में होती है
दिल में, दिमाग में और अक्सर
मेरे आंसुओ में
मुझे बारिशो में रोना अच्छा लगता है
ये बुँदे उन बूंदों में समां जाती है
और तुम्हे पता भी नहीं चलता है
उम्मीद है ये बारिश ख़ुशी के आंसू भी लाएगी
इस जिंदगी में ना सही
अगली जिंदगी में तो आएगी
मुझे बारिशो में रोना अच्छा लगता है
ये बुँदे उन बूंदों में समां जाती है
और तुम्हे पता भी नहीं चलता है
Saturday, June 11, 2011
Tuesday, May 24, 2011
मै और तुम
जब भी
मै तुझसे
खफा होता हु
तो सोचता हु की
अब
तुझसे
कभी बात नहीं करूँगा
ठान लेता हु
बस
अब बहुत हो चुका
पर
हर बार
हार जाता हु
तुझसे भी
और
अपने आप से भी
पर वो हार भी
तो
कही अन्दर से
मुझे अच्छी लगती है
शायद
मै हर वक़्त
यही
मन्नत मांगता हु
की मै कभी
कभी भी
तुम से
जीत ना पाऊ
और
खुद से
भी
मै तुझसे
खफा होता हु
तो सोचता हु की
अब
तुझसे
कभी बात नहीं करूँगा
ठान लेता हु
बस
अब बहुत हो चुका
पर
हर बार
हार जाता हु
तुझसे भी
और
अपने आप से भी
पर वो हार भी
तो
कही अन्दर से
मुझे अच्छी लगती है
शायद
मै हर वक़्त
यही
मन्नत मांगता हु
की मै कभी
कभी भी
तुम से
जीत ना पाऊ
और
खुद से
भी
Sunday, May 22, 2011
आग
बस्ती जल रही थी
आग फैली थी
चारो तरफ
सिर्फ
आग
बस
आग
भड़क रही थी
हर तरफ
बस्ती में
पेट में
मन में
आग
दुःख की
गुस्से की
प्रतिशोध की
पर
ना तो वो आग
उनके आंसू सुखा पा रही थी
और
ना ही उनके आंसू
उस आग को बुझा पा रहे थे
आग फैली थी
चारो तरफ
सिर्फ
आग
बस
आग
भड़क रही थी
हर तरफ
बस्ती में
पेट में
मन में
आग
दुःख की
गुस्से की
प्रतिशोध की
पर
ना तो वो आग
उनके आंसू सुखा पा रही थी
और
ना ही उनके आंसू
उस आग को बुझा पा रहे थे
Wednesday, May 18, 2011
चाँद
तेरा मेरा हमराज ये चाँद
इस काली स्याह रात में
राह भटकता होगा चाँद
कभी तुम्हे तो कभी मुझे
याद करता होगा चाँद
कभी समंदर की लहरों में
अपने आप को खोजता होगा चाँद
तो कभी चंपा के फूलों के पीछे
आंसू बहाता होगा चाँद
तेरे मेरे जिंदगी के कितना करीब है ये चाँद
वैसे तो मैंने चाँद को
हर रोज तिल तिल टूटते हुवे देखा है
कभी खुदसे तो कभी
दुसरो से रुठते हुवे देखा है
शायद उसकी उम्मीद
उसे फिर ले आती है
कभी उसे
तो कभी मुझे रुलाती है
शायद..... शायद
मेरी उम्मीदों का चाँद भी
कुछ इस कदर ही
बनता बिखरता होगा
कभी खुद रोता तो
कभी मुझे रुलाता होगा
इस काली स्याह रात में
राह भटकता होगा चाँद
कभी तुम्हे तो कभी मुझे
याद करता होगा चाँद
कभी समंदर की लहरों में
अपने आप को खोजता होगा चाँद
तो कभी चंपा के फूलों के पीछे
आंसू बहाता होगा चाँद
तेरे मेरे जिंदगी के कितना करीब है ये चाँद
वैसे तो मैंने चाँद को
हर रोज तिल तिल टूटते हुवे देखा है
कभी खुदसे तो कभी
दुसरो से रुठते हुवे देखा है
शायद उसकी उम्मीद
उसे फिर ले आती है
कभी उसे
तो कभी मुझे रुलाती है
शायद..... शायद
मेरी उम्मीदों का चाँद भी
कुछ इस कदर ही
बनता बिखरता होगा
कभी खुद रोता तो
कभी मुझे रुलाता होगा
बारिश
जिंदगी भर झुलसता ही रहा
कभी सूरज की अगन से
तो कभी मन की तपन से
चार दिनों के लिए आई थी तुम बारिश बन के
अब वही यादें
आंसू बन कर
मेरी आँखों को भीगा रहे है
कभी सूरज की अगन से
तो कभी मन की तपन से
चार दिनों के लिए आई थी तुम बारिश बन के
अब वही यादें
आंसू बन कर
मेरी आँखों को भीगा रहे है
Sunday, May 15, 2011
खुदकुशी
खुदकुशी
जिंदगी में कई ब़ार सोचा है की
ख़ुदकुशी कर लू
इस तरह घुट घुट के मरने से तो अच्छा है
एक ही ब़ार में खुद को मुक्त कर लू
पर फिर दिखता है
वो चेहरा जिसने मुझे बांध रखा है
या वो सपने जिन्होंने
ये दिल थाम रखा है
अब भी उम्मीद है
तुमसे मिलने की
जानता हु ये
मृग मरीचिका है
पर कुछ और जीने का
ये बहाना बना रखा है
हर रोज सांसों को बची हुई
रेजगारी की तरह खर्च कर रहा हु
और हर सुबह ऊपर वाले साहूकार से
नया कर्ज मांग रहा हु
जानता हु की ये क़र्ज़ चुका ना पाउँगा
और किसी दिवालिये की तरह
जिंदगी के बाज़ार से उठ जाऊंगा
पर हर रोज जीतने की उम्मीद में नया दाव लगा रहा हु
कभी खुद को तो कभी जिंदगी को आजमां रहा हु
एक गुजारिश है तुझसे
इसके पहले की साहूकार अपना हिसाब मांग ले
मुझसे एक ब़ार मिल जा
ताकि मुझे ख़ुदकुशी से पहले ही
मुक्ति मिल जाये
जिंदगी में कई ब़ार सोचा है की
ख़ुदकुशी कर लू
इस तरह घुट घुट के मरने से तो अच्छा है
एक ही ब़ार में खुद को मुक्त कर लू
पर फिर दिखता है
वो चेहरा जिसने मुझे बांध रखा है
या वो सपने जिन्होंने
ये दिल थाम रखा है
अब भी उम्मीद है
तुमसे मिलने की
जानता हु ये
मृग मरीचिका है
पर कुछ और जीने का
ये बहाना बना रखा है
हर रोज सांसों को बची हुई
रेजगारी की तरह खर्च कर रहा हु
और हर सुबह ऊपर वाले साहूकार से
नया कर्ज मांग रहा हु
जानता हु की ये क़र्ज़ चुका ना पाउँगा
और किसी दिवालिये की तरह
जिंदगी के बाज़ार से उठ जाऊंगा
पर हर रोज जीतने की उम्मीद में नया दाव लगा रहा हु
कभी खुद को तो कभी जिंदगी को आजमां रहा हु
एक गुजारिश है तुझसे
इसके पहले की साहूकार अपना हिसाब मांग ले
मुझसे एक ब़ार मिल जा
ताकि मुझे ख़ुदकुशी से पहले ही
मुक्ति मिल जाये
Monday, May 9, 2011
रिश्ता
मेरा,
जिंदगी और दर्द से अजीब सा रिश्ता है
जिंदगी ने मुझे दर्द दिया
और अब
दर्द मुझसे जिंदगी ले लेगा
जिंदगी और दर्द से अजीब सा रिश्ता है
जिंदगी ने मुझे दर्द दिया
और अब
दर्द मुझसे जिंदगी ले लेगा
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