एक अकेली लम्बी उदास शाम
अंतहीन सन्नाटे से और भी लम्बी होती हुवी
और अपनी बोझिल रफ़्तार से रात की और बढती हुवी
गली में दूर दूर तक कोई नहीं
ना इस छोर पे ना ही उस छोर पे
दूर कोने के खम्बे पे जलता हुवा एक मद्धिम बल्ब
अपनी पीली बीमार रोशनी (?) से माहोल को और बीमार बनाता हुवा
गली का एक मात्र पेड़ भी अपने अकेलेपन से बचने के लिए इधर उधर देख रहा है
जैसे किसी आवारा कुत्ते को तलाश रहा हो
कभी कभी सन्नाटे को चीरती हुवी चौकीदार की सिटी या फिर
डंडे को जमीं पे पटकने की आवाज़
ये कभी दिखाई नहीं देता.... कभी भी
खुद ही के वजूद से जूझता हुवा
मानो उसका होना भी एक धोखा है
इस सन्नाटे से बचने के लिए मै लौट जाता हु अपने कमरे पे
काफी बोझिल कदमो से जैसे अपने आप को धकेल रहा हु उस सन्नाटे से दूर
पर जब कमरे के अन्दर देखता हु तो लगता है जैसे सिर्फ दृश्य बदला है माहोल नहीं
खाली कमरे के अन्दर का वो तनहा सन्नाटा गोया
बाहर के सन्नाटे से अपने वजूद को बड़ा करता हुवा
बड़ा अजीब सा कभी कभी जैसे सन्नाटा भी खाली लगता है
मानो वो भी खाली खाली महसुस कर रहा हो
अपने आप में सिमटा हुवा
खाली कमरे की खाली दीवारे
वैसे एक अकेली छिपकली है जो कभी कभी
दिवार के अकेलेपन को दूर करने की कोशिश करती है
या फिर दिवार से मिल के खुद के अकेलेपन को पता नहीं
दरवाजे के खुलने के आवाज से मै खुद ही चौक जाता हु
जैसे कही जबरदस्ती घुस रहा हु
फिर वही रोज की कोशिश दीवारों को पहचानने की
और खुद से ही अपनापन जताने की
शायद........ शायद..........
एक थकी हुई सी कोशिश खुद को बहलाने की
अगली सुबह तक खुद को उलझाने की
ताकि फिर एक बार सूरज मुझे
मदद करे खुद को पहचानने में
और ले चले एक बार फिर जिंदगी की और
जिसके इंतजार में सुबह की शाम हुई है
ये जिंदगी तमाम हुई है
Monday, January 17, 2011
Sunday, January 16, 2011
राग
कधी तरी मी असाच रागावतो कुणावर ही
आणि मग विचार करतो
की मी का रागावलो
नंतर मला कळते की मी स्वत वरच रागावलो आहे
पण ते कळे पर्यंत उशीर झालेला असतो
कुणाला तरी काही तरी बोललो असतो
कुठे तरी काही तरी बिनसले असते
राग येतो मला माझा आणि बहुतेक तुझा ही
नाही फक्त माझाच येतो
आणि मग मी विसरायचा प्रयत्न करतो
सगळेच जे आपल्यात घडले आहे ते
आणि जे घडायचे राहून गेले ते पण
पण ते विसरता येत नाही
का ते माहित नाही
आणि मग अजून राग येतो तुझा
पण रागावतो मी माझ्यावरच
कारण तुझ्यावर अजूनही रागावता येतच नाही मला
आणि मग विचार करतो
की मी का रागावलो
नंतर मला कळते की मी स्वत वरच रागावलो आहे
पण ते कळे पर्यंत उशीर झालेला असतो
कुणाला तरी काही तरी बोललो असतो
कुठे तरी काही तरी बिनसले असते
राग येतो मला माझा आणि बहुतेक तुझा ही
नाही फक्त माझाच येतो
आणि मग मी विसरायचा प्रयत्न करतो
सगळेच जे आपल्यात घडले आहे ते
आणि जे घडायचे राहून गेले ते पण
पण ते विसरता येत नाही
का ते माहित नाही
आणि मग अजून राग येतो तुझा
पण रागावतो मी माझ्यावरच
कारण तुझ्यावर अजूनही रागावता येतच नाही मला
Tuesday, December 28, 2010
फासले...............................................
फासले कभी मिलो के तो कभी दिलो के
कुछ हमने बनाये हुवे और कुछ हमने मिटाए हुवे
कुछ जिंदगी भर साथ रह कर भी बन जाने वाले
तो कुछ जिंदगी भर साथ साथ चलने वाले
कभी जिंदगी भर एक साथ चार दीवारों के बीच रह कर भी
बन जाने वाले और फिर कभी खत्म ना होने वाले
तो कुछ ऐसे जो मिलो दूर रह कर भी
महसूस ना होने वाले
कई बार मिलो के फासले यु ही तय हो जाते है
तो दिलो के फासलों को मिटाने में जिंदगी निकल जाती है
कई बार समाज इन्हें बढ़ा देता है तो कभी हमारी सोच
और हम उलझ के रह जाते है अपने ही बुने हुवे जाल में
कई ब़ार सांस अटक जाती है तो कई बार अल्फाज नहीं मिलते
वरना ये फासले ना इस तरह से बनते और ना ही बढ़ते
सिर्फ एक कदम, एक अल्फाज, एक नजर, एक मुस्कुराहट
शायद कहानी को बदल देती
ना वो फासले होते ना ये कहानी होती
कुछ हमने बनाये हुवे और कुछ हमने मिटाए हुवे
कुछ जिंदगी भर साथ रह कर भी बन जाने वाले
तो कुछ जिंदगी भर साथ साथ चलने वाले
कभी जिंदगी भर एक साथ चार दीवारों के बीच रह कर भी
बन जाने वाले और फिर कभी खत्म ना होने वाले
तो कुछ ऐसे जो मिलो दूर रह कर भी
महसूस ना होने वाले
कई बार मिलो के फासले यु ही तय हो जाते है
तो दिलो के फासलों को मिटाने में जिंदगी निकल जाती है
कई बार समाज इन्हें बढ़ा देता है तो कभी हमारी सोच
और हम उलझ के रह जाते है अपने ही बुने हुवे जाल में
कई ब़ार सांस अटक जाती है तो कई बार अल्फाज नहीं मिलते
वरना ये फासले ना इस तरह से बनते और ना ही बढ़ते
सिर्फ एक कदम, एक अल्फाज, एक नजर, एक मुस्कुराहट
शायद कहानी को बदल देती
ना वो फासले होते ना ये कहानी होती
Monday, December 27, 2010
तुम कहा हो.......
बड़ी मुद्दत हो गयी है तुम्हारी आवाज़ सुने हुवे
और उससे भी ज्यादा वक़्त गुजर गया है तुम्हे देखे हुवे
फिर भी क्यों लगता है जैसे ये कल ही की बात हो
वो taxi का लम्बा इंतजार
और डर किसीके देख लेने का
तुम्हारा अविरत बाते करना और
मेरा सिर्फ तुम्हारी और देखते रहना
और कभी कभी वो व्यर्थ की बहस
और फिर लम्बी चुप्पी
हमारा वो निशब्द वार्तालाप
और फिर तकलीफ वक़्त के ख़त्म हो जाने की
वो समंदर का किनारा, चाँद की वो मद्धम रौशनी
शोर मचाती हुवी और हमारे कदमो के निशान मिटाती वो लहरें
हमें डराती तो कभी हमें भिगाती पर फिर भी हमें अपने पास बुलाती
एक एकाकी नाव किसी लहर के इंतजार में
बगैर किसी मल्लाह के
पास ही के पेड़ो पर के वो चंपा के फूल
हमें एक टक निहारते हुवे
ना जाने क्यों हर वक़्त ये लगता है जैसे तुमसे मुलाक़ात होगी
और मै अपने आप को भुला कर फिर करने लगता हु इंतजार
पर लगता है इंतजार की जिंदगी इस जिंदगी से भी लम्बी है
पता नहीं कभी कभी मै तुम्हारी याद में तुम्हारा इंतजार करना भी भूल जाता हु
शायद अब मुझे तुम्हारे बगैर रहने की आदत हो गयी है
या फिर मैंने खुदको धोका देना सीख लिया है
और उससे भी ज्यादा वक़्त गुजर गया है तुम्हे देखे हुवे
फिर भी क्यों लगता है जैसे ये कल ही की बात हो
वो taxi का लम्बा इंतजार
और डर किसीके देख लेने का
तुम्हारा अविरत बाते करना और
मेरा सिर्फ तुम्हारी और देखते रहना
और कभी कभी वो व्यर्थ की बहस
और फिर लम्बी चुप्पी
हमारा वो निशब्द वार्तालाप
और फिर तकलीफ वक़्त के ख़त्म हो जाने की
वो समंदर का किनारा, चाँद की वो मद्धम रौशनी
शोर मचाती हुवी और हमारे कदमो के निशान मिटाती वो लहरें
हमें डराती तो कभी हमें भिगाती पर फिर भी हमें अपने पास बुलाती
एक एकाकी नाव किसी लहर के इंतजार में
बगैर किसी मल्लाह के
पास ही के पेड़ो पर के वो चंपा के फूल
हमें एक टक निहारते हुवे
ना जाने क्यों हर वक़्त ये लगता है जैसे तुमसे मुलाक़ात होगी
और मै अपने आप को भुला कर फिर करने लगता हु इंतजार
पर लगता है इंतजार की जिंदगी इस जिंदगी से भी लम्बी है
पता नहीं कभी कभी मै तुम्हारी याद में तुम्हारा इंतजार करना भी भूल जाता हु
शायद अब मुझे तुम्हारे बगैर रहने की आदत हो गयी है
या फिर मैंने खुदको धोका देना सीख लिया है
Friday, December 17, 2010
शराब और सोच
पहले मै काफी सोचता था पीने से पहले
काफी समझाता था अपने आप को
कभी ये की पीना बुरी बात है
और फिर अगले ही पल की ठीक है यार कभी कभी तो पी रहे हो
और फिर पी ही लेता था
और फिर पीने के बाद फिर से सोचता था
कभी लगता था की मैंने ठीक ही किया
और कभी मै अपने आप से नाराज होता था
पर अब मै समझ गया हु की ये सब गलत है
फालतू है , व्यर्थ है और अब मै इस नतीजे पे पंहुचा हु की......
मैंने ये सब छोड़ ही देना चाहिए
इसलिए अब मैंने बार बार सोचना छोड़ दिया है पिने के पहले भी और पिने के बाद भी
अब मै पीता हु और...............
सिर्फ पीने के बारे में सोचता हु
काफी समझाता था अपने आप को
कभी ये की पीना बुरी बात है
और फिर अगले ही पल की ठीक है यार कभी कभी तो पी रहे हो
और फिर पी ही लेता था
और फिर पीने के बाद फिर से सोचता था
कभी लगता था की मैंने ठीक ही किया
और कभी मै अपने आप से नाराज होता था
पर अब मै समझ गया हु की ये सब गलत है
फालतू है , व्यर्थ है और अब मै इस नतीजे पे पंहुचा हु की......
मैंने ये सब छोड़ ही देना चाहिए
इसलिए अब मैंने बार बार सोचना छोड़ दिया है पिने के पहले भी और पिने के बाद भी
अब मै पीता हु और...............
सिर्फ पीने के बारे में सोचता हु
Tuesday, December 14, 2010
काय सांगू आणि कसे सांगू,
काय सांगू आणि कसे सांगू, माझे मलाच काही कलेना
कधीतरी मी विचारतो स्वतालाच प्रश्न
आणि मग शोधत बसतो त्याची उत्तरे
काय सांगू आणि कसे सांगू, माझे मलाच काही कलेना
कधीतरी असे वाटते की समजले आता मला सगले
आणि दुसऱ्याच क्षणी सगले blank होवून जाते
काय सांगू आणि कसे सांगू, माझे मलाच काही कलेना
कधीतरी फिरत असतो असाच आणि शोधत असतो
स्वताला दाही दिशां मधे
आणि नंतर लक्षात येते की मी हरवून बसलोय माझ्यातच
काय सांगू आणि कसे सांगू, माझे मलाच काही कलेना
कधीतरी अथक प्रयत्न करतो जुन्या गोष्टी विसरण्याचा
आणि आनखिनाच अडकत जातो नको त्या आठ्वानिं मधे
सगले प्रयत्न निरर्थक ठरतात
काय सांगू आणि कसे सांगू, माझे मलाच काही कलेना
कधीतरी मी विचारतो स्वतालाच प्रश्न
आणि मग शोधत बसतो त्याची उत्तरे
काय सांगू आणि कसे सांगू, माझे मलाच काही कलेना
कधीतरी असे वाटते की समजले आता मला सगले
आणि दुसऱ्याच क्षणी सगले blank होवून जाते
काय सांगू आणि कसे सांगू, माझे मलाच काही कलेना
कधीतरी फिरत असतो असाच आणि शोधत असतो
स्वताला दाही दिशां मधे
आणि नंतर लक्षात येते की मी हरवून बसलोय माझ्यातच
काय सांगू आणि कसे सांगू, माझे मलाच काही कलेना
कधीतरी अथक प्रयत्न करतो जुन्या गोष्टी विसरण्याचा
आणि आनखिनाच अडकत जातो नको त्या आठ्वानिं मधे
सगले प्रयत्न निरर्थक ठरतात
काय सांगू आणि कसे सांगू, माझे मलाच काही कलेना
Sunday, December 12, 2010
घर .....
आलिशान बंगला भी यहाँ घर है
३ Bhk / २ Bhk / १ Bhk / १ RK भी यहाँ घर है
१०*१० का कमरा भी यहाँ घर है
साझे के कमरे में आया हुवा एक पलंग भी यहाँ घर है
और फूटपाथ भी यहाँ घर है
क्योंकि शाम ढलते ही हर बन्दा ये ही कहता है
" चल दोस्त निकलता हु घर जाना है "
३ Bhk / २ Bhk / १ Bhk / १ RK भी यहाँ घर है
१०*१० का कमरा भी यहाँ घर है
साझे के कमरे में आया हुवा एक पलंग भी यहाँ घर है
और फूटपाथ भी यहाँ घर है
क्योंकि शाम ढलते ही हर बन्दा ये ही कहता है
" चल दोस्त निकलता हु घर जाना है "
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